चंडीगढ़ 22 जनवरी( दैनिक खबरनामा ) चंडीगढ़।कभी घने जंगलों और समृद्ध वन्य जीवन के लिए पहचाना जाने वाला शिवालिक क्षेत्र आज गंभीर पर्यावरणीय संकट से गुजर रहा है। पंजाब यूनिवर्सिटी में किए गए एक ताज़ा वैज्ञानिक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यदि मौजूदा हालात नहीं सुधरे, तो आने वाले वर्षों में शिवालिक की कई दुर्लभ और स्थानीय प्रजातियां पूरी तरह समाप्त हो सकती हैं।
यह शोध पीयू के वनस्पति विज्ञान विभाग की मृदा पारिस्थितिकी तंत्र एवं पुनर्स्थापन पारिस्थितिकी प्रयोगशाला द्वारा किया गया है। अध्ययन में बताया गया है कि बढ़ती जनसंख्या, शहरी विस्तार और संसाधनों के अत्यधिक दोहन ने प्राकृतिक पारिस्थितिकी संतुलन को बुरी तरह प्रभावित किया है।जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चिंता शोधकर्ता डॉ. आनंद नारायण सिंह के अनुसार, जंगलों की लगातार कटाई, प्राकृतिक आवासों का विखंडन, औद्योगिक प्रदूषण और बाहरी आक्रामक प्रजातियों का बढ़ता फैलाव स्थानीय वनस्पतियों और जीव-जंतुओं के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन चुका है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।चंडीगढ़ से मोरनी हिल्स तक दिख रहा असर अध्ययन में सामने आया है कि बीते 100 से 150 वर्षों में शिवालिक क्षेत्र के जंगलों का बड़ा हिस्सा खत्म हो चुका है। इसका असर चंडीगढ़, पंचकूला, मोहाली और मोरनी हिल्स से सटे इलाकों में स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है, जहां मिट्टी का कटाव, भूस्खलन और मानव–वन्यजीव संघर्ष तेजी से बढ़ रहा है।खनन और शहरीकरण सबसे बड़े कारण
रिपोर्ट के मुताबिक, अवैध और अनियंत्रित खनन ने पहाड़ियों और नदियों की प्राकृतिक संरचना को भारी नुकसान पहुंचाया है। वहीं, रिहायशी परियोजनाओं और सड़कों के निर्माण से जंगल छोटे-छोटे हिस्सों में बंट गए हैं, जिससे जैव विविधता पर सीधा प्रभाव पड़ा है।विदेशी पौधों से बढ़ा खतरा लैंटाना, पार्थेनियम और प्रोसोपिस जैसी विदेशी आक्रामक वनस्पतियों के फैलाव ने स्थानीय प्रजातियों को पीछे धकेल दिया है। इसके साथ ही अनियमित वर्षा के कारण भूमि क्षरण और गली कटाव की समस्या भी बढ़ती जा रही है।
तत्काल संरक्षण जरूरी वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ठोस संरक्षण उपाय नहीं किए गए, तो शिवालिक की जैव विविधता को अपूरणीय क्षति हो सकती है। उन्होंने सरकार और प्रशासन से पर्यावरण संरक्षण की योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने की अपील की है।

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