दैनिक खबरनामा 21 अप्रैल 2026 शिमला हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) ने पार्ट-टाइम पीएचडी कार्यक्रम के लिए दाखिला प्रक्रिया में बड़ा बदलाव करते हुए नई व्यवस्था लागू कर दी है। विश्वविद्यालय द्वारा जारी एडेंडम के अनुसार अब पार्ट-टाइम पीएचडी में प्रवेश नियमित पीएचडी सीटों से अलग अतिरिक्त श्रेणी में किया जाएगा, जिसे कुल निर्धारित सीटों में शामिल नहीं किया जाएगा।नई व्यवस्था के तहत पार्ट-टाइम पीएचडी कार्यक्रम पूरी तरह अलग ट्रैक पर संचालित होगा। इससे विश्वविद्यालय नियमित सीटों को प्रभावित किए बिना अधिक अभ्यर्थियों को शोध का अवसर दे सकेगा। साथ ही, सुपरवाइजर को अपनी तय अधिकतम सीमा से अलग इन शोधार्थियों का मार्गदर्शन करना होगा।विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि यह कदम शोध के अवसरों का विस्तार करने के उद्देश्य से उठाया गया है, ताकि सीटों की सीमा बढ़ाए बिना अधिक से अधिक इच्छुक अभ्यर्थियों को मौका मिल सके। पार्ट-टाइम पीएचडी केवल कार्यरत उम्मीदवारों के लिए ही उपलब्ध होगी और इसके लिए अनुभव आधारित पात्रता तय की गई है।नियमित पद पर कार्यरत शिक्षकों और शोधकर्ताओं के लिए न्यूनतम तीन वर्ष का अनुभव अनिवार्य किया गया है, जबकि गेस्ट या कॉन्ट्रैक्ट आधार पर कार्य करने वालों के लिए यह सीमा पांच वर्ष निर्धारित की गई है। अनुसंधान एवं विकास संगठनों, सार्वजनिक उपक्रमों और प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़े अभ्यर्थियों के लिए भी पांच वर्ष का अनुभव जरूरी होगा, जबकि अन्य पेशेवरों के लिए सात वर्ष का अनुभव अनिवार्य रखा गया है।चयन प्रक्रिया नियमित पीएचडी की तरह ही होगी, हालांकि कुछ श्रेणियों को निर्धारित शर्तों के तहत प्रवेश परीक्षा से छूट दी गई है। ऐसे मामलों में विभागीय स्तर पर इंटरव्यू के जरिए मूल्यांकन किया जाएगा। इंटरव्यू के लिए 30 अंकों का विस्तृत पैटर्न तय किया गया है, जिसमें अनुभव, नेट/जेआरएफ योग्यता, शोध प्रस्ताव, प्रस्तुति और उसके बचाव को शामिल किया गया है।
इसके अलावा, पार्ट-टाइम पीएचडी के लिए नियोक्ता से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) देना अनिवार्य होगा, जिसमें यह स्पष्ट होना चाहिए कि अभ्यर्थी को कोर्स वर्क और शोध कार्य के लिए पर्याप्त समय और अवकाश मिलेगा। शोध कार्य विश्वविद्यालय परिसर या कार्यस्थल दोनों जगह से किया जा सकेगा, बशर्ते आवश्यक सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित हो।विश्वविद्यालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि पार्ट-टाइम और फुल-टाइम पीएचडी डिग्री में कोई अंतर नहीं होगा और दोनों के लिए समान शैक्षणिक मानक लागू रहेंगे।