दैनिक खबरनामा। चंडीगढ़, 18 जुलाई: आईडीएफसी बैंक के माध्यम से चंडीगढ़ स्मार्ट सिटी लिमिटेड और नगर निगम के खातों में हुए 116 करोड़ रुपये के गड़बड़झाले के मामले में सीबीआई ने विशेष अदालत में अपनी चार्जशीट पेश कर दी है। इस रिपोर्ट में जांच एजेंसी ने कारोबारी विक्रम वधवा और अन्य नामजद लोगों के बीच बने कथित वित्तीय जाल का पर्दाफाश किया है।
सीबीआई का दावा है कि फर्जी फर्मों के जरिए इधर-उधर की गई रकम का एक बड़ा हिस्सा सीधे विक्रम वधवा तक पहुंचा। जांच के दौरान बैंक स्टेटमेंट, व्हाट्सएप मैसेज, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, नकद लेन-देन और करोड़ों की प्रॉपर्टी के दस्तावेजों को आधार बनाकर वधवा को इस पूरे खेल का कथित फायदा लेने वाला बताया गया है।
एजेंसी के अनुसार विक्रम वधवा ने इस घोटाले से करीब 74 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया। इसी पैसों से उसने चंडीगढ़ और न्यू चंडीगढ़ में कई महंगी जमीनें और मकान खरीदे। इनमें पिछले साल सेक्टर-33 में खरीदी गई करीब 23 करोड़ रुपये की आलीशान कोठी भी शामिल है। इस कोठी की रजिस्ट्री 9 अप्रैल 2025 को हुई थी।
सीबीआई ने बताया कि इस खरीद के लिए फरवरी से अप्रैल 2025 के बीच इन्फिनिटी इंफ्रा प्राइवेट लिमिटेड को कई डिमांड ड्राफ्ट और आरटीजीएस के जरिए भुगतान भेजे गए थे।
जांच रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि स्मार्ट सिटी लिमिटेड के खातों से निकाली गई रकम पहले कैपको फिनटेक सर्विसेज जैसी शेल कंपनियों में डाली गई। वहां से यह पैसा घुमा-फिराकर विक्रम वधवा के निजी बैंक अकाउंट में पहुंचा। सीबीआई के मुताबिक फर्जी कंपनियों के माध्यम से वधवा को कुल 31.62 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए गए।
वधवा और रिभव की पत्नी के बीच 25 लेनदेन
सीबीआई के अनुसार फरवरी से अक्टूबर 2025 तक विक्रम वधवा और इस केस के मुख्य आरोपी रिभव ऋषि की पत्नी दिव्या अरोड़ा के बीच 25 बार बैंकिंग लेनदेन हुआ। इन ट्रांजेक्शन में लगभग 24.13 करोड़ रुपये जमा हुए और 6.53 करोड़ रुपये निकाले गए।
रिपोर्ट में कहा गया है कि रिभव ऋषि ने भी इस घोटाले से करोड़ों कमाए। उसने बड़ी रकम नकद में भी इधर-उधर की। इस काम के लिए उसने दो कैश हैंडलर रखे हुए थे। सीबीआई ने उन दोनों के बयान दर्ज किए हैं।
नकली एफडी बनाकर की हेराफेरी
सीबीआई ने दो महीने पहले इस मामले में एफआईआर दर्ज की थी। इससे पहले इसकी जांच चंडीगढ़ पुलिस कर रही थी। पता चला कि स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत बैंक में रखी गई एफडी की रकम का गलत इस्तेमाल किया गया।
आरोप है कि पैसे निकालकर निजी कामों में लगा दिए गए और बाद में पकड़े न जाने के डर से रिकॉर्ड में बदलाव कर फर्जी एफडी के कागज तैयार कर दिए गए।
स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद बची हुई ग्रांट और बैंक में जमा राशि को नगर निगम के खातों में भेजा जाना था। इसी दौरान खुलासा हुआ कि स्मार्ट सिटी के खाते में कोई एफडी बची ही नहीं है। जो एफडी के दस्तावेज मिले वे नकली निकले। इसके बाद पूरे मामले की गहन जांच शुरू हुई।