दैनिक खबरनामा | 18 अगस्त | नई दिल्ली: अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता संभालने के पांच वर्ष पूरे होने पर दिल्ली स्थित अफगान दूतावास में पहली बार ‘विक्ट्री डे’ यानी विजय दिवस के तौर पर कार्यक्रम आयोजित किया गया। आयोजन में तालिबान की सत्ता और उसकी मौजूदा नीतियों का उल्लेख किया गया। कार्यक्रम में भारत सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी की मौजूदगी भी चर्चा का प्रमुख विषय रही। इस दौरान भारत में अफगानिस्तान के प्रभारी राजदूत नूर अहमद नूर ने दोनों देशों के बीच संबंधों को और मजबूत करने की आवश्यकता बताते हुए भारत से अहम समर्थन की अपील की।
राजनीतिक भरोसे और आर्थिक साझेदारी पर जोर
कार्यक्रम में नूर अहमद नूर ने कहा कि काबुल और नई दिल्ली के बीच राजनीतिक विश्वास को मजबूत करना और आर्थिक सहयोग बढ़ाना मौजूदा समय की जरूरत है। उनके मुताबिक, दोनों देशों के बीच लगातार और मजबूत संबंधों का लाभ केवल भारत और अफगानिस्तान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे पूरे क्षेत्र में स्थिरता और साझा आर्थिक प्रगति को भी बढ़ावा मिल सकता है।
अफगानिस्तान की मौजूदा विदेश नीति का उल्लेख करते हुए नूर ने कहा कि उनकी सरकार दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने और ‘संतुलित जुड़ाव’ की नीति पर आगे बढ़ रही है। उन्होंने विशेष रूप से भारत के साथ व्यापक और मजबूत आर्थिक रिश्ते विकसित करने की इच्छा जाहिर की।
भारतीय विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी भी कार्यक्रम में पहुंचे
कार्यक्रम में भारत सरकार की ओर से आधिकारिक प्रतिनिधित्व भी हुआ। विदेश मंत्रालय के पाकिस्तान-अफगानिस्तान-ईरान (पीएआई) संभाग के प्रमुख एवं संयुक्त सचिव आनंद प्रकाश कार्यक्रम में शामिल हुए।
यह मौजूदगी इसलिए महत्वपूर्ण मानी गई क्योंकि भारत ने अब तक तालिबान सरकार को औपचारिक रूप से मान्यता नहीं दी है। इसके बावजूद भारतीय वरिष्ठ अधिकारी की कार्यक्रम में भागीदारी दोनों देशों के बीच जारी कूटनीतिक संपर्क के संदर्भ में महत्वपूर्ण संकेत के तौर पर देखी जा रही है।
नूर अहमद नूर ने कहा कि बीते कुछ वर्षों में भारत और अफगानिस्तान के बीच राजनयिक संवाद में वृद्धि हुई है। दोनों देशों के दूतावास पहले की तुलना में अधिक सक्रिय हुए हैं और उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडलों की ओर से एक-दूसरे की राजधानियों के दौरे भी किए गए हैं।
ऐतिहासिक रिश्तों का हवाला देकर भारत से मांगा समर्थन
अफगान प्रभारी राजदूत ने दोनों देशों के सदियों पुराने संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि काबुल, हेरात और कंधार जैसे अफगान शहरों में भारतीय व्यापारी और कारोबारी कारवां लंबे समय से आते-जाते रहे हैं। दूसरी ओर, दिल्ली और लाहौर जैसे शहरों पर अफगान विद्वानों, कवियों और सूफी परंपरा का प्रभाव रहा है।
उन्होंने दोनों देशों के स्वतंत्रता संघर्ष के साझा इतिहास का भी उल्लेख किया और कहा कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ संघर्ष के दौरान भारत और अफगानिस्तान ने एक-दूसरे को प्रेरणा दी।
इसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जुड़ाव का हवाला देते हुए नूर अहमद नूर ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अफगानिस्तान के अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए भारत से खुले तौर पर समर्थन देने की अपील की। उन्होंने दोनों देशों के बीच आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को आगे बढ़ाने को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण बताया।