दैनिक खबरनामा 16 अप्रैल 2026 पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने जमानत याचिकाओं को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि अदालत में आने वाले हर याचिकाकर्ता का दायित्व है कि वह सभी प्रासंगिक तथ्यों का पूर्ण और निष्पक्ष खुलासा करे। कोर्ट ने कहा कि कोई भी पक्ष यह तय नहीं कर सकता कि कौन सी जानकारी देनी है और कौन सी छिपानी है, क्योंकि न्याय की प्रक्रिया पूरी तरह सत्यनिष्ठा पर आधारित होती है।मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस सुमित गोयल ने कहा कि वर्तमान डिजिटल युग में केस से जुड़ी जानकारी आसानी से सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध होती है, इसलिए “जानकारी नहीं थी” जैसी दलील स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायालय से राहत मांगते समय पारदर्शिता बनाए रखना न केवल नैतिक, बल्कि कानूनी जिम्मेदारी भी है।यह टिप्पणी उस समय सामने आई जब लुधियाना के एक याचिकाकर्ता ने जमानत के लिए दायर याचिका में अपनी पूर्व जमानत याचिका का उल्लेख नहीं किया। मामले में 22 अक्टूबर 2025 को फरीदकोट सिटी थाने में विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज हुई थी। कोर्ट ने कहा कि जमानत जैसे विवेकाधीन मामलों में सर्वोच्च सद्भावना का सिद्धांत बेहद महत्वपूर्ण है।अदालत ने यह भी कहा कि अगली जमानत याचिकाओं पर विचार करते समय यह देखना जरूरी होता है कि पिछली याचिका खारिज होने के बाद परिस्थितियों में क्या बदलाव आया है। ऐसे में पूर्व याचिकाओं की जानकारी छिपाना न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करता है और निष्पक्ष निर्णय में बाधा बन सकता है।हालांकि, मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता 27 अक्टूबर 2025 से हिरासत में था, जांच पूरी हो चुकी है और चालान भी पेश किया जा चुका है, लेकिन 21 गवाहों में से एक का भी बयान दर्ज नहीं हुआ। अदालत ने माना कि ट्रायल पूरा होने में लंबा समय लग सकता है।इन परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता को नियमित जमानत दे दी, लेकिन पूर्व जमानत याचिका छिपाने पर 10,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया। साथ ही चेतावनी दी कि भविष्य में इस तरह की प्रवृत्ति पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।