दैनिक खबरनामा। चंडीगढ़, 18 जुलाई: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने रिटायर्ड कर्मचारियों के पेंशन अधिकारों को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ किया कि अगर कोई कर्मचारी पहले जिला बोर्ड में काम कर चुका है तो उस सेवा को सिर्फ इस वजह से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि उस दौरान उसने कान्ट्रिब्यूटरी प्रोविडेंट फंड में पैसा नहीं जमा किया था।
जस्टिस हरकेश मनुजा की बेंच ने पंजाब सरकार की अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट और पहली अपील अदालत के फैसले को बरकरार रखा।
क्या है पूरा मामला
लुधियाना के रहने वाले हरदयाल सिंह ने 31 अगस्त 1953 से 30 सितंबर 1957 तक जिला बोर्ड के स्कूलों में नौकरी की थी। 1 अक्टूबर 1957 को जब इन स्कूलों को पंजाब सरकार में मिला दिया गया तो वह सरकारी कर्मचारी बन गए। 30 जून 1986 को वह सरकारी हाई स्कूल, धर्मपुरा से हेडमास्टर के पद से रिटायर हुए। रिटायरमेंट के बाद जब उनके लाभ तय किए गए तो सरकार ने जिला बोर्ड वाली 4 साल की सेवा को पेंशन की गणना में नहीं जोड़ा। इस वजह से उन्हें पूरी पेंशन, ग्रेच्युटी, छुट्टियों का नकद भुगतान, जीपीएफ, हेडमास्टर ग्रेड के लाभ और अन्य रिटायरमेंट सुविधाएं नहीं मिल पाईं।
सरकार ने क्या दलील दी
निचली अदालत ने 1 अगस्त 1995 को हरदयाल सिंह के हक में फैसला दिया था। पहली अपील कोर्ट ने भी उसी आदेश को सही ठहराया और जिला बोर्ड की सेवा को पेंशन में जोड़ने को कहा।
इसके बाद पंजाब सरकार हाई कोर्ट पहुंच गई। सरकार का कहना था कि उस समय की सेवा पेंशन के दायरे में नहीं आती और कर्मचारी ने सीपीएफ में योगदान भी नहीं किया था। सरकार ने पंजाब एजुकेशनल सर्विस क्लास-3 नियम, 1961 के नियम 13(2) का हवाला देकर कहा कि ऐसी पुरानी सेवा का लाभ नहीं दिया जा सकता।
कोर्ट ने क्यों खारिज की सरकार की दलील
हाई कोर्ट ने सरकार की दलीलों को मानने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जिस अवधि की सेवा का विवाद है वह 1953 से 1957 की है, जबकि 1961 के नियम उसके बाद बने हैं।
रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि उस समय जिला बोर्ड के कर्मचारियों के लिए सीपीएफ में योगदान करना पेंशन की शर्त थी। बेंच ने टिप्पणी की कि “नियम 13(2) में कहीं भी यह नहीं लिखा कि सीपीएफ का सदस्य न होने पर पिछली सेवा को पेंशन में नहीं गिना जाएगा।”
सरकार की यह दलील भी कोर्ट ने नहीं मानी कि हरदयाल सिंह की पहले वाली नौकरी एडहॉक थी। इस पर कोर्ट ने बिमला देवी बनाम हरियाणा राज्य के फैसले का हवाला दिया और कहा कि पेंशन तय करते समय एडहॉक सेवा को भी जोड़ा जाता है।
इन्हीं कारणों के आधार पर हाई कोर्ट ने पंजाब सरकार की दूसरी अपील को खारिज कर दिया और रिटायर्ड कर्मचारियों के हित में जिला बोर्ड की सेवा को पेंशन में जोड़ने का रास्ता साफ कर दिया।