दैनिक खबरनामा। चंडीगढ़, 6 जून 2026: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि किसी आरोपी से अतिरिक्त जानकारी हासिल करने के उद्देश्य से मात्र उसे पुलिस हिरासत में लेना कानून के अनुरूप नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि बरामदगी (रिकवरी) हो जाने के बाद केवल और अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए कस्टोडियल इंटेरोगेशन (हिरासत में पूछताछ) की मांग उचित नहीं है। ऐसा प्रयास दबाव या जबरन जानकारी हासिल करने की श्रेणी में आ सकता है।

जस्टिस संजय वशिष्ठ ने यह टिप्पणी बठिंडा जिले के फूल थाना में दर्ज पंजाब आबकारी अधिनियम से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने आरोपी की याचिका स्वीकार करते हुए निचली अदालत द्वारा वापस ली गई अंतरिम अग्रिम जमानत को बहाल कर उसे स्थायी कर दिया।

मामले के अनुसार आरोपी पर अवैध शराब बनाने और रखने का आरोप है। बठिंडा की अतिरिक्त सत्र अदालत ने पहले आरोपी को अंतरिम अग्रिम जमानत प्रदान करते हुए जांच में शामिल होने का निर्देश दिया था। अदालत का मानना था कि मकान के स्वामित्व और कब्जे से जुड़े कुछ पहलुओं की जांच शेष है, लेकिन आरोपी की हिरासत आवश्यक नहीं है।

बाद में जांच अधिकारी ने अदालत को बताया कि आरोपी 19 मई को जांच में शामिल हो चुका है तथा उसके मामले में 400 लीटर लाहन और 10 लीटर अवैध शराब की बरामदगी भी हो चुकी है। हालांकि पुलिस ने यह तर्क दिया कि आरोपी से यह पता लगाने के लिए हिरासत में पूछताछ जरूरी है कि शराब बनाने का सामान किसने उपलब्ध कराया और तैयार की गई शराब किन लोगों को बेची जानी थी।

इस आधार पर सत्र अदालत ने अंतरिम संरक्षण वापस लेते हुए आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। हाई कोर्ट ने इस फैसले को त्रुटिपूर्ण बताते हुए पलट दिया।

जस्टिस वशिष्ठ ने कहा कि निचली अदालत ने यह गंभीरता से नहीं परखा कि बरामदगी हो जाने और आरोपी के जांच में शामिल होने के बाद वास्तव में उसकी हिरासत की आवश्यकता थी या नहीं। अदालत ने कहा कि यदि जांच एजेंसी उन लोगों की पहचान नहीं कर पा रही है, जिन्हें कथित रूप से शराब बेची जानी थी या जिनसे उपकरण खरीदे गए थे, तो यह आरोपी की अग्रिम जमानत रद्द करने का वैध आधार नहीं बन सकता।

हाई कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी का दायित्व है कि वह कानूनी और पेशेवर तरीके से साक्ष्य एकत्र करे तथा अन्य संभावित आरोपियों तक पहुंचे। अदालत ने यह भी माना कि आरोपी ने अंतरिम जमानत का कोई दुरुपयोग नहीं किया था। उसके खिलाफ न तो जांच में सहयोग न करने का आरोप था और न ही किसी शर्त के उल्लंघन की शिकायत।

इन परिस्थितियों में अदालत ने माना कि केवल अतिरिक्त जानकारी प्राप्त करने के लिए हिरासत की मांग उचित नहीं थी। हाई कोर्ट ने अपने पुनरीक्षण अधिकारों का प्रयोग करते हुए सत्र अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें अंतरिम संरक्षण वापस लिया गया था। साथ ही आरोपी को दी गई अंतरिम अग्रिम जमानत को स्थायी करते हुए आवश्यकता पड़ने पर जांच में सहयोग जारी रखने के निर्देश दिए।

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