दैनिक खबरनामा ब्यूरो। शिकागो, 15 जून: अमेरिका में आयोजित 2026 फीफा विश्व कप के दौरान इबोला वायरस के संक्रमित व्यक्ति के देश में पहुंचने की संभावना बेहद कम है, हालांकि इसे पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। अमेरिकी संक्रामक रोग विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ऐसा कोई मामला सामने आता है तो अमेरिकी अस्पताल उससे निपटने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

गौरतलब है कि 2014 में पश्चिम अफ्रीका में फैले इबोला प्रकोप के दौरान लाइबेरिया के नागरिक थॉमस एरिक डंकन इबोला के लक्षणों के साथ टेक्सास के डलास स्थित अस्पताल पहुंचे थे, लेकिन शुरुआती चरण में उन्हें वापस भेज दिया गया था। बाद में उन्हें भर्ती किया गया, जबकि उनकी देखभाल करने वाली दो नर्सें भी संक्रमित हुई थीं, हालांकि वे स्वस्थ हो गई थीं।

इस घटना के बाद अमेरिका ने इबोला से निपटने की तैयारी पर 26 करोड़ डॉलर से अधिक खर्च किए और 13 विशेष उपचार केंद्र स्थापित किए। इनका उद्देश्य अस्पतालों को संभावित इबोला मरीजों की पहचान, अलगाव और सुरक्षित उपचार के लिए तैयार करना था।

अटलांटा स्थित एमोरी विश्वविद्यालय के संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. गेविन हैरिस ने कहा, “हम संक्रमण के हर मामले को नहीं रोक सकते, लेकिन आज हम पहले से कहीं अधिक तैयार हैं।”

विश्व कप के दौरान लगभग 65 लाख प्रशंसकों के उत्तर अमेरिका पहुंचने की उम्मीद है। 39 दिनों तक चलने वाले इस टूर्नामेंट में अमेरिका, मेक्सिको और कनाडा में कुल 104 मैच खेले जाएंगे। ऐसे में स्वास्थ्य एजेंसियां विभिन्न संक्रामक रोगों से निपटने की तैयारी कर रही हैं।

अमेरिकी रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र (CDC), पैन अमेरिकन हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने विश्व कप मेजबान देशों के लिए इबोला के खतरे को कम बताया है। विशेषज्ञों का कहना है कि बड़ी भीड़ के दौरान खसरा, कोविड-19 और इन्फ्लूएंजा जैसी बीमारियों का जोखिम अधिक होता है।

हालांकि, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (डीआरसी) में जारी इबोला प्रकोप चिंता का विषय बना हुआ है। इस प्रकोप में अब तक 675 से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं और 135 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।

पूर्व सीडीसी निदेशक और “रिजॉल्व टू सेव लाइव्स” संस्था के प्रमुख डॉ. टॉम फ्राइडन ने कहा, “विश्व कप में किसी के लिए इबोला का खतरा बेहद कम है। इबोला हवा से नहीं फैलता और सामान्य संपर्क से संक्रमण नहीं होता। इसके लिए संक्रमित व्यक्ति के शारीरिक द्रवों के सीधे संपर्क की आवश्यकता होती है।”

उन्होंने कहा, “लेकिन कम जोखिम का मतलब शून्य जोखिम नहीं है। जब तक डीआरसी में प्रकोप पूरी तरह खत्म नहीं हो जाता, तब तक खतरा बना रहेगा।”

विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका ने 2015 से इबोला तैयारियों को मजबूत किया है। हजारों स्वास्थ्यकर्मियों को इबोला और अन्य खतरनाक रोगजनकों की पहचान एवं उपचार का प्रशिक्षण दिया जा चुका है।

विश्व कप के मद्देनजर संभावित महामारी स्थितियों से निपटने के लिए देशभर में अभ्यास भी किए गए हैं। चिकित्सकों को मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया जैसी मच्छरजनित बीमारियों के बारे में भी जागरूक किया गया है, जो कुछ देशों में अधिक प्रचलित हैं।

अमेरिका, मेक्सिको और कनाडा ने इबोला प्रभावित देशों से आने वाले गैर-नागरिकों के प्रवेश पर प्रतिबंध और हवाई अड्डों पर स्क्रीनिंग जैसी व्यवस्थाएं लागू की हैं। माना जा रहा है कि इन कदमों से विश्व कप स्थलों पर इबोला का खतरा और कम होगा।

विश्व कप के प्रत्येक मेजबान शहर में फीफा, स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारी और अस्पतालों ने चिकित्सा समितियां गठित की हैं, जो विभिन्न टीमों और देशों के आधार पर संक्रामक रोगों के जोखिम का आकलन कर रही हैं। निगरानी के लिए अपशिष्ट जल परीक्षण, वायु गुणवत्ता डेटा और इलेक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड जैसे आधुनिक साधनों का उपयोग किया जा रहा है।

हालांकि विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि सीडीसी में कर्मचारियों की कटौती, अमेरिका का WHO से अलग होना और सार्वजनिक स्वास्थ्य विभागों पर बढ़ता दबाव भविष्य में चुनौतियां पैदा कर सकता है।

डॉ. टॉम फ्राइडन ने कहा, “मेरी सबसे बड़ी चिंता यह है कि हजारों कर्मचारियों को खोने के बाद क्या सीडीसी के पास इतनी क्षमता बची है कि वह अमेरिका और डीआरसी दोनों जगह तेजी से कार्रवाई कर सके।”

इसके बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की स्वास्थ्य प्रणाली बड़े आयोजनों के दौरान संक्रामक रोगों से निपटने के लिए पहले से कहीं अधिक सक्षम और तैयार है।

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