25 दिसम्बर जगदीश कुमारराजस्थान के भरतपुर जिले का ऐतिहासिक नगर डीग, जिसे पूर्वी सिंहद्वार के रूप में जाना जाता है, अपनी गौरवशाली विरासत और स्वाभिमानी इतिहास के लिए देशभर में प्रसिद्ध रहा है। डीगवासियों के लिए यह गर्व की बात है कि यह क्षेत्र मुगलों और अंग्रेजों के शासनकाल में भी लंबे समय तक स्वतंत्र रहा और विदेशी सत्ता के आगे कभी पूरी तरह नतमस्तक नहीं हुआ।देश की आज़ादी से पहले डीग, भरतपुर रियासत की राजधानी हुआ करता था। बाद में भरतपुर को जिला बनाया गया और अब डीग स्वयं एक स्वतंत्र जिला बन चुका है। यह परिवर्तन डीग के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक महत्व को दर्शाता है।इतिहास के पन्नों में भरतपुर और डीग का नाम वीरता और अदम्य साहस के प्रतीक के रूप में दर्ज है। लौहगढ़ किले की अभेद्य शक्ति से प्रभावित होकर देश के महान नेता सरदार वल्लभभाई पटेल ने भरतपुर को “लौहगढ़” की उपाधि दी थी, जो यहां के शौर्य और रणनीतिक मजबूती का प्रमाण है।डीग की पहचान महाराजा सूरजमल जी और उनके पूर्वजों की वीरता गाथाओं से जुड़ी हुई है। जाट शासक महाराजा सूरजमल जी ने न केवल भरतपुर रियासत को सशक्त बनाया, बल्कि धर्म, संस्कृति और स्वाभिमान की रक्षा के लिए भी अपना जीवन समर्पित किया। उनकी दूरदर्शिता, युद्ध कौशल और न्यायप्रिय शासन आज भी लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।वीर-शिरोमणि, हिंदू धर्मरक्षक और अजेय दुर्ग लौहगढ़ के अजेय शासक, युगपुरुष महाराजा श्री सूरजमल जी के बलिदान दिवस (शौर्य दिवस) के अवसर पर क्षेत्रवासियों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। लोगों ने उनके त्याग, बलिदान और शौर्य को नमन करते हुए संकल्प लिया कि उनकी गौरवशाली विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक जीवित रखा जाएगा।डीग की धरती आज भी अपने गौरवशाली अतीत पर गर्व करती है और महाराजा सूरजमल जी के आदर्शों को आत्मसात करते हुए आगे बढ़ रही है।
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