हरियाणा 6 जनवरी( दैनिक खबरनामा ) सरकार को अदालत से बड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार कर्मचारियों की नियुक्ति के नाम या श्रेणी के आधार पर उनके अधिकारों से इनकार नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि संविधान नियुक्ति के नामकरण से नहीं, बल्कि कार्य की वास्तविक प्रकृति से जुड़े अधिकारों को देखता है और राज्य से निष्पक्ष व्यवहार की अपेक्षा करता है।राज्य सरकार द्वारा याचिकाओं में देरी का हवाला देकर उठाई गई आपत्ति को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि एक बार जब नियमितीकरण नीति बनाई जाती है, तो उसे लागू करना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी बन जाती है। विशेष रूप से समाज के सबसे निचले तबके से जुड़े कर्मचारियों के मामलों में यदि प्रशासन लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं करता, तो इसे सतत कारण (कंटीन्यूइंग कॉज ऑफ एक्शन) माना जाएगा और इसी आधार पर राहत से इनकार नहीं किया जा सकता।अदालत ने सभी याचिकाओं को स्वीकार करते हुए कर्मचारियों के दावों को खारिज करने वाले पूर्व आदेशों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने हरियाणा सरकार को निर्देश दिया कि कर्मचारियों को उसी नीति के तहत नियमित किया जाए, जो उस समय लागू थी जब वे पहली बार नियमितीकरण के लिए पात्र बने थे।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वे कर्मचारी भी नियमितीकरण के हकदार होंगे, जो पहले की नीतियों में शामिल नहीं थे, लेकिन 31 दिसंबर 2025 तक दस वर्ष से अधिक की सेवा पूरी कर चुके हैं।इसके साथ ही कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि कर्मचारियों को सभी परिणामी लाभ दिए जाएं, जिनमें वेतन निर्धारण, बकाया राशि और उस पर छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज शामिल है। पूरी प्रक्रिया आठ सप्ताह के भीतर पूरी करने का आदेश दिया गया है।फैसले के अंत में अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 न केवल सरकारी सेवा में प्रवेश, बल्कि पूरे सेवाकाल को नियंत्रित करते हैं। एक कल्याणकारी राज्य प्रक्रियागत आपत्तियों या नाम बदलकर उन कर्मचारियों को उनके वैध अधिकारों से वंचित नहीं कर सकता, जिन्होंने दशकों तक राज्य की सेवा की है।
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