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नई दिल्ली (दैनिक खबरनामा), 4 जून 2026। सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि पति-पत्नी के बीच लंबे समय तक अलगाव और वैवाहिक संबंधों को पुनर्जीवित करने के लिए किसी वास्तविक प्रयास का अभाव ‘मानसिक क्रूरता’ की श्रेणी में आ सकता है। अदालत ने इसी आधार पर 15 वर्षों से अलग रह रहे एक दंपति के तलाक को मंजूरी दे दी।

सर्वोच्च अदालत ने कहा कि जब वैवाहिक संबंध व्यवहारिक रूप से समाप्त हो चुके हों और उनके पुनर्स्थापन की कोई संभावना न बची हो, तब विवाह को केवल कानूनी औपचारिकता के रूप में बनाए रखना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

क्या था मामला?

मामला दो सरकारी डॉक्टरों से जुड़ा है, जिनका विवाह 5 दिसंबर 2007 को गुजरात के खेड़ा जिले के नडियाद में हुआ था। दंपति की कोई संतान नहीं है। पति ने वर्ष 2009 में राजस्थान के भरतपुर स्थित फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर करते हुए मानसिक क्रूरता का आरोप लगाया था।

फैमिली कोर्ट ने पर्याप्त आधार न होने का हवाला देते हुए याचिका खारिज कर दी थी। बाद में जनवरी 2025 में राजस्थान हाईकोर्ट ने पति के पक्ष में फैसला सुनाते हुए तलाक मंजूर कर लिया। इस आदेश को पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

‘बिना उचित कारण दूरी बनाना मानसिक क्रूरता’

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि बिना किसी ठोस कारण या शारीरिक अक्षमता के लंबे समय तक वैवाहिक संबंधों से दूरी बनाए रखना मानसिक क्रूरता का आधार बन सकता है।

पीठ ने कहा कि विवाह केवल कानूनी संबंध नहीं, बल्कि भावनात्मक सहयोग, पारस्परिक विश्वास और साझा जिम्मेदारियों का बंधन है। यदि इनमें से मूल तत्व लंबे समय तक अनुपस्थित रहें, तो इसका प्रभाव वैवाहिक संबंधों की स्थिरता पर पड़ता है।

‘शब्द नहीं, व्यवहार अधिक महत्वपूर्ण’

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि पत्नी ने विवाह को बनाए रखने की इच्छा व्यक्त की थी, लेकिन रिकॉर्ड पर ऐसे प्रयासों के पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले जो इस इच्छा को व्यवहारिक रूप से दर्शाते हों। अदालत ने कहा कि किसी रिश्ते को बचाने के लिए केवल मौखिक इच्छा पर्याप्त नहीं होती, बल्कि उसके अनुरूप कदम उठाना भी आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर मई 2025 में कराई गई मध्यस्थता प्रक्रिया भी सफल नहीं हो सकी, जिससे दोनों पक्षों के बीच मतभेद और स्पष्ट हो गए।

अनुच्छेद 142 के तहत दिया अंतिम आदेश

पीठ ने माना कि दोनों पक्ष पिछले 15 वर्षों से अलग रह रहे हैं, उनके जीवन के रास्ते अलग हो चुके हैं और वैवाहिक संबंधों के पुनर्जीवित होने की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी है। ऐसे में अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142(1) के तहत प्राप्त विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए विवाह को समाप्त करने का आदेश दिया।

अदालत ने कहा कि पूरी तरह टूट चुके संबंध को जबरन बनाए रखने से केवल मानसिक तनाव और असंतोष बढ़ता है। चूंकि दोनों पक्ष आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं और उनकी कोई संतान नहीं है, इसलिए तलाक के निर्णय से किसी तीसरे पक्ष के हित प्रभावित नहीं होंगे।

इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी की अपील खारिज करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट के तलाक संबंधी आदेश को बरकरार रखा।

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