दैनिक खबरनामा ब्यूरो। पेरिस/तेहरान, 15 जून  : अमेरिका और ईरान ने अपने बीच चल रहे संघर्ष को समाप्त करने के लिए एक महत्वपूर्ण समझौते पर सहमति बना ली है। हालांकि समझौते की पूरी शर्तें अभी सार्वजनिक नहीं की गई हैं, लेकिन दोनों देशों ने इसकी पुष्टि की है।

एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी के अनुसार, समझौता ज्ञापन (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकर क़ालिबाफ ने हस्ताक्षर किए हैं। समझौते के तहत होर्मुज जलडमरूमध्य को तत्काल प्रभाव से खोला जाएगा और ईरान पर अमेरिकी नाकेबंदी हटाई जाएगी।

अमेरिकी अधिकारी ने बताया कि होर्मुज जलडमरूमध्य अगले 60 दिनों तक बिना किसी शुल्क के जहाजों के लिए खुला रहेगा। इससे वैश्विक तेल आपूर्ति और समुद्री व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि होने की उम्मीद है।

फ्रांस में जी-7 शिखर सम्मेलन से पहले मीडिया से बातचीत में राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ समझौता तय हो चुका है। उन्होंने दोहराया कि ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। ट्रंप ने कहा कि समझौते का पूरा पाठ शुक्रवार के बाद सार्वजनिक किया जाएगा और जब तक ईरान अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा नहीं करता, तब तक प्रतिबंधों में राहत नहीं दी जाएगी।

ईरान ने स्पष्ट किया है कि उसके परमाणु कार्यक्रम पर विस्तृत बातचीत बाद में की जाएगी। वहीं, समझौते की सफलता लेबनान की स्थिति पर भी निर्भर हो सकती है, जो वार्ता में एक प्रमुख विवाद का विषय रहा है।

इज़राइल ने कहा है कि वह लेबनान के कब्जे वाले क्षेत्रों से पीछे नहीं हटेगा और यदि लेबनान की घटनाओं के कारण ईरान उस पर हमला करता है, तो वह जवाबी कार्रवाई करेगा। दूसरी ओर, हिज़्बुल्लाह ने अमेरिका-ईरान समझौते का स्वागत किया है।

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि लेबनान के खिलाफ इज़राइली हमलों को पूरी तरह रोका जाना चाहिए। हालांकि अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि लेबनान से इज़राइल की वापसी इस समझौते की शर्त नहीं है और इज़राइल को हिज़्बुल्लाह के किसी भी हमले से अपनी रक्षा करने का अधिकार रहेगा।

अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, समझौते का औपचारिक हस्ताक्षर समारोह शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में आयोजित किया जा सकता है। समझौते के तकनीकी पहलुओं पर चर्चा भी इसी सप्ताह शुरू होने की संभावना है।

विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है, तो इससे पश्चिम एशिया में तनाव कम हो सकता है और वैश्विक ऊर्जा बाजारों को स्थिरता मिल सकती है।

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