दैनिक खबरनामा। शिमला, 5 अगस्त: सुप्रीम कोर्ट ने अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीम और उसके क्लिप्स के सोशल मीडिया पर गलत इस्तेमाल को लेकर अपने पहले दिए गए आदेश की व्याख्या साफ की है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि अब मान्यता प्राप्त समाचार संस्थान भी कोर्ट रूम की वीडियो या ऑडियो रिकॉर्डिंग को अपनी खबरों में नहीं दिखा सकेंगे।
अदालत ने स्पष्ट किया कि खबर देने पर रोक नहीं है। प्रिंट और डिजिटल मीडिया आम लोगों तक कानूनी मामलों और फैसलों की जानकारी लिखित रिपोर्ट के जरिए दे सकते हैं। लेकिन वीडियो क्लिप शेयर करने की बात आए तो मीडिया संस्थानों पर भी वही पाबंदियां लागू होंगी जो किसी आम सोशल मीडिया यूजर पर लगती हैं।
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद यह स्पष्टीकरण दिया। पीठ ने कहा कि 24 जुलाई 2026 को जारी अंतरिम आदेश के पैरा 11 को लेकर भ्रम की स्थिति बनी थी, इसलिए इसे स्पष्ट करना जरूरी था।
कोर्ट के अनुसार, समाचार चैनलों और पोर्टलों को रिपोर्टिंग की आजादी है, मगर कार्यवाही की मूल ऑडियो-वीडियो फुटेज इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं होगी। वीडियो से जुड़े प्रतिबंधों का पालन करना उनके लिए कानूनी रूप से अनिवार्य होगा।
आदेश में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के महासचिव या किसी राज्य के हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की लिखित अनुमति के बगैर अदालती कार्यवाही की रिकॉर्डिंग को काट-छांट कर, दोबारा पोस्ट कर, अपलोड कर या उससे कमाई करना डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पूरी तरह वर्जित रहेगा।
इस मामले में अदालत ने पहले ही गूगल, यूट्यूब, एक्स और मेटा को पक्षकार बनाकर जवाब तलब किया है। मेटा के तहत फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप आते हैं।
साथ ही सभी राज्यों के हाईकोर्ट्स को लाइव स्ट्रीमिंग के लिए तय मॉडल नियमों को लागू करने की अब तक की प्रगति रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है। केंद्र सरकार को भी निर्देश दिया गया है कि वह नोडल मंत्रालयों के माध्यम से इन दिशा-निर्देशों को जमीन पर लागू करने के लिए एक विस्तृत प्रस्ताव तैयार कर कोर्ट में पेश करे।