दैनिक खबरनामा | चंडीगढ़, 16 जुलाई 2026. गुरमत विचारधारा, सामाजिक सेवा और सिख विरासत के प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय योगदान के लिए पूर्व सांसद तरलोचन सिंह को पंजाब कला परिषद द्वारा पहला यादगारी ‘गुरमति रतन’ अवार्ड प्रदान किया जाएगा। यह सम्मान पद्म श्री डॉ. रतन सिंह जग्गी मेमोरियल चैरिटेबल फाउंडेशन के सहयोग से स्थापित किया गया है।
पंजाब कला परिषद के अनुसार, इस सम्मान के तहत तरलोचन सिंह को 51 हजार रुपये की नकद राशि, सम्मान स्वरूप दुशाला और स्मृति चिह्न भेंट किया जाएगा। पुरस्कार के लिए गठित जूरी में डॉ. बलकार सिंह, डॉ. निवेदिता सिंह, डॉ. आतम रंधावा और मलविंदर सिंह जग्गी शामिल थे।
परिषद ने बताया कि तरलोचन सिंह ने अपने सार्वजनिक जीवन के दौरान गुरमति सिद्धांतों को समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचाने और वैश्विक स्तर पर सिख दर्शन एवं मानवीय मूल्यों का संदेश फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। धार्मिक सद्भाव, सामाजिक न्याय और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए उनके योगदान को व्यापक सम्मान प्राप्त है।
गौरतलब है कि तरलोचन सिंह वर्ष 2004 से 2010 तक राज्यसभा सदस्य रहे हैं। इसके अलावा उन्होंने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष के रूप में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने में उनकी सक्रिय भूमिका को देखते हुए उन्हें देशभर में सम्मानित व्यक्तित्व के रूप में जाना जाता है।
इस अवसर पर पंजाब कला परिषद ने यह भी जानकारी दी कि परिषद के ओपन एयर थिएटर के नवीनीकरण का कार्य डॉ. रतन सिंह जग्गी मेमोरियल चैरिटेबल फाउंडेशन के सहयोग से कराया जा रहा है। परिषद ने घोषणा की कि भविष्य में यह सम्मान प्रत्येक वर्ष गुरमति सिद्धांतों और मानवीय मूल्यों के प्रचार-प्रसार में विशेष योगदान देने वाले किसी प्रतिष्ठित व्यक्तित्व को प्रदान किया जाएगा।
पद्म श्री डॉ. रतन सिंह जग्गी को पंजाबी, हिंदी, गुरमति और भक्ति आंदोलन साहित्य के शीर्ष विद्वानों में गिना जाता है। उन्होंने अपने जीवनकाल में गुरु साहिबान की वाणी, मध्यकालीन साहित्य और भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं पर व्यापक शोध किया। उनकी लगभग 150 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें श्री गुरु ग्रंथ साहिब और श्री दशम ग्रंथ साहिब की व्याख्याएं, विश्वकोशीय ग्रंथ तथा पंजाबी साहित्य से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण कृतियां शामिल हैं।
वर्ष 2023 में भारत सरकार ने साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान को देखते हुए उन्हें ‘पद्म श्री’ सम्मान से अलंकृत किया था। साहित्य जगत में उनके योगदान को आज भी एक अमूल्य धरोहर के रूप में देखा जाता है।