चंडीगढ़ 31 जनवरी 2026 ( जगदीश कुमार) चंडीगढ़।उत्तर भारत के ग्रामीण और कृषि इलाकों में दशकों से आतंक का पर्याय रहे ‘सल्फास’ (एल्यूमिनियम फॉस्फाइड) ज़हर के इलाज को लेकर एक ऐतिहासिक सफलता सामने आई है। जिसे अब तक भारत का सबसे घातक और लगभग लाइलाज ज़हर माना जाता था, उसके उपचार में चंडीगढ़ स्थित पीजीआईएमईआर के डॉक्टरों ने निर्णायक वैज्ञानिक मोड़ ला दिया है।पीजीआई के आंतरिक चिकित्सा विभाग द्वारा किए गए एक नियंत्रित और रैंडमाइज्ड क्लिनिकल अध्ययन में यह पहली बार वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हुआ है कि इंट्रावीनस लिपिड इमल्शन (ILE) थेरेपी सेल्फोस ज़हर से पीड़ित गंभीर मरीजों के लिए जीवनरक्षक साबित हो सकती है। यह खोज न केवल चिकित्सा विज्ञान की दिशा बदलने वाली है, बल्कि हर साल इस ज़हर से जूझने वाले हजारों परिवारों के लिए नई उम्मीद भी लेकर आई है।गांवों से जिला अस्पतालों तक डर का नाम था सल्फास’एल्यूमिनियम फॉस्फाइड ज़हरखुरानी के मामलों में अब तक इलाज का मतलब अक्सर सीमित विकल्प, बेबस डॉक्टर और बेहद कम बचने की संभावना होता था। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों और जिला अस्पतालों में ऐसे मरीजों को बचा पाना एक बड़ी चुनौती बना हुआ था।दुनिया का पहला नियंत्रित अध्ययन पीजीआईएमईआर के डॉक्टरों के अनुसार, यह दुनिया का पहला ऐसा नियंत्रित क्लिनिकल अध्ययन है जिसमें लिपिड इमल्शन थेरेपी के लाभों को ठोस वैज्ञानिक आंकड़ों के साथ साबित किया गया है। अध्ययन में सामने आया कि यह थेरेपी केवल सहायक इलाज नहीं, बल्कि गंभीर मरीजों में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।अनुभवी नेतृत्व में हुआ शोध इस महत्वपूर्ण अध्ययन का मार्गदर्शन पीजीआईएमईआर के डीन (अकादमिक) और आंतरिक चिकित्सा विभाग के प्रमुख डॉ. संजय जैन ने किया। गंभीर मरीजों के इलाज में उनके लंबे अनुभव और क्लिनिकल नेतृत्व ने शोध को व्यावहारिक और भरोसेमंद बनाया।रैंडमाइज्ड क्लिनिकल स्टडी के प्रमुख अन्वेषक डॉ. मंदीप सिंह भाटिया रहे, जबकि डॉ. सौरभ चंद्रभान शारदा सह-अन्वेषक के रूप में शामिल रहे। आंतरिक चिकित्सा विभाग के कई अन्य चिकित्सकों ने भी इस अध्ययन में सक्रिय योगदान दिया।संस्थान की सामाजिक प्रतिबद्धता का प्रमाण
इस शोध परियोजना को पीजीआईएमईआर की मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च सेल (MERC) से वित्तीय सहयोग मिला, जो संस्थान की समाजोपयोगी, मरीज-केंद्रित और ज़मीनी जरूरतों से जुड़ी रिसर्च के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

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