नई दिल्ली फरवरी 2026( दैनिक खबरनामा) नई दिल्ली रेलवे प्रशासन और स्पेशल रेलवे मजिस्ट्रेट (एसआरएम) के बीच करीब 10 साल पुराने विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए रेलवे मजिस्ट्रेट की शक्तियों पर स्पष्ट सीमा तय कर दी है। कोर्ट ने कहा कि एसआरएम रेलवे के आंतरिक प्रशासनिक मामलों और अधिकारियों के कामकाज में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं कर सकते। यह फैसला 13 जनवरी को सुनाया गया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने अंबाला के तत्कालीन रेलवे मजिस्ट्रेट नितिन राज के आदेशों को रद्द कर दिया और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट व जिला सत्र न्यायालय के फैसलों पर कड़ी टिप्पणी की।मामला वर्ष 2016 का है, जब अंबाला के वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक (तत्कालीन) प्रवीण गौड द्विवेदी से रेलवे मजिस्ट्रेट ने टिकट चेकिंग के लिए स्थायी मजिस्ट्रेट दस्ता उपलब्ध कराने की मांग की थी। प्रवीण गौड द्विवेदी ने हलफनामे के साथ कारण बताते हुए दस्ता देने से इनकार कर दिया। इसके बाद मजिस्ट्रेट ने इसे आदेश की अवहेलना मानते हुए उनके खिलाफ मानहानि का केस दर्ज कराया और अवमानना की कार्रवाई शुरू कर दी। निचली अदालत और हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट के पक्ष में फैसला दिया था, जिसे प्रवीण गौड द्विवेदी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और एन.के. सिंह की बेंच ने कहा कि कोई व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं बन सकता। कोर्ट ने इसे शक्तियों का दुरुपयोग बताते हुए पुराने आदेश रद्द कर दिए। इस फैसले से रेलवे प्रशासन और न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र की सीमा स्पष्ट हुई है।
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