दैनिक खबरनामा 5 मार्च 2026 बिना जरूरत एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल अब एक गंभीर स्वास्थ्य खतरे के रूप में सामने आ रहा है, जिसका असर मां के दूध और नवजात शिशुओं तक पहुंचने लगा है। पीजीआई के विशेषज्ञों द्वारा किए गए एक ताजा शोध में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। इस अध्ययन का नेतृत्व नवजात रोग विशेषज्ञ डॉ. सौरभ दत्ता ने किया, जबकि टीम में डॉ. अंबिका शर्मा, मनीष बिस्वाल, अन्वेषा चक्रवर्ती, डॉ. वनिता सूरी और डॉ. राजा राय शामिल रहे। यह शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल Breastfeeding Medicine (2025) में प्रकाशित हुआ है।
अध्ययन के तहत 28 से 34 सप्ताह में जन्मे 100 प्रीटर्म मां-बच्चे के जोड़ों को शामिल किया गया। डिलीवरी के 10वें दिन तक मां के दूध और नवजात के मुंह से सैंपल लेकर जांच की गई। जांच में कई मामलों में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस जीन दोनों में पाए गए। खासतौर पर ESBL और कार्बापेनेमेज जैसे खतरनाक जीन—BLA-IMP, BLA-CIT और BLA-SHV—की मौजूदगी सामने आई, जो इस बात का संकेत है कि बैक्टीरिया अब सामान्य एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति असरहीन होते जा रहे हैं।विशेषज्ञों के अनुसार डिलीवरी के आसपास एंटीबायोटिक का अधिक उपयोग मां के शरीर में ऐसे बैक्टीरिया को बढ़ावा देता है, जो दवाओं के प्रति प्रतिरोधी होते हैं और स्तनपान के जरिए नवजात तक पहुंच सकते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इससे स्तनपान के महत्व को कम नहीं आंका जाना चाहिए। मां का दूध नवजात के लिए अब भी सबसे सुरक्षित और पोषण से भरपूर है।डॉक्टरों ने सलाह दी है कि एंटीबायोटिक का इस्तेमाल केवल जरूरत पड़ने पर और डॉक्टर की सलाह से ही किया जाए। साथ ही अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण, स्वच्छता और दवा प्रबंधन पर विशेष ध्यान देकर इस बढ़ते खतरे को रोका जा सकता है।