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नई दिल्ली, 5 जून 2026 (दैनिक खबरनामा): अमेरिका जर्मनी को लंबी दूरी की टोमाहॉक क्रूज मिसाइलें उपलब्ध कराने की प्रस्तावित योजना पर पुनर्विचार कर सकता है। विभिन्न कूटनीतिक और सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, वॉशिंगटन में इस मुद्दे पर उच्च स्तर पर चर्चा जारी है, जहां संभावित सुरक्षा और भू-राजनीतिक प्रभावों का आकलन किया जा रहा है।

सूत्रों का कहना है कि अमेरिकी नीति-निर्माताओं के एक वर्ग को आशंका है कि जर्मनी में लंबी दूरी की अमेरिकी मिसाइलों की तैनाती को रूस उकसावे की कार्रवाई के रूप में देख सकता है। ऐसी स्थिति में यूरोप में सुरक्षा तनाव बढ़ने और सैन्य प्रतिस्पर्धा तेज होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

यह प्रस्ताव मूल रूप से पूर्व अमेरिकी प्रशासन के दौरान जर्मनी और नाटो सहयोगियों के साथ व्यापक रणनीतिक विचार-विमर्श के बाद सामने आया था। हालांकि अब मौजूदा अमेरिकी नेतृत्व इसके दीर्घकालिक प्रभावों और क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों की समीक्षा कर रहा है।

जर्मनी लंबे समय से रूस से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियों का हवाला देते हुए अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने की मांग करता रहा है। ऐसे में यदि मिसाइल समझौते को रोकने या रद्द करने का निर्णय लिया जाता है, तो इसे बर्लिन और अन्य यूरोपीय सहयोगियों के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक झटका माना जा सकता है।

नाटो के प्रति बदलती अमेरिकी प्राथमिकताएं

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल एक मिसाइल समझौते तक सीमित नहीं है, बल्कि नाटो और यूरोप के प्रति अमेरिकी रणनीतिक दृष्टिकोण में संभावित बदलाव का संकेत भी हो सकता है। हाल के वर्षों में अमेरिका बार-बार यह संकेत देता रहा है कि यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा और रक्षा तैयारियों में अधिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए।

इसी क्रम में नाटो के वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों ने भी सदस्य देशों से रक्षा निवेश और सैन्य क्षमताओं को बढ़ाने का आग्रह किया है। साथ ही, अमेरिका का ध्यान तेजी से इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की ओर केंद्रित होता दिखाई दे रहा है, जिसे आने वाले वर्षों में वैश्विक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का प्रमुख केंद्र माना जा रहा है।

विश्लेषकों के अनुसार, यदि जर्मनी के साथ टोमाहॉक मिसाइल समझौता रद्द किया जाता है, तो इसका असर ट्रांस-अटलांटिक सुरक्षा ढांचे पर पड़ सकता है। साथ ही, यह यूरोपीय देशों पर अपनी स्वतंत्र रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने का दबाव भी बढ़ा सकता है।

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