दैनिक खबरनामा। चंडीगढ़, 28 अक्टूबर: सोशल मीडिया पर अलग-अलग राय रखना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन ऐसे तथ्य जो मौजूद ही नहीं हैं, उनका प्रचार कर समाज में अशांति फैलाने की कोशिश गंभीर मामला है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने LPU और चितकारा विश्वविद्यालय से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर भ्रामक कंटेंट फैलाने के आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और फर्जी तथ्यों से माहौल बिगाड़ने की कोशिश की जांच होनी चाहिए।
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि 12 अक्टूबर के आदेश के बाद सोशल मीडिया पर मौजूद ज्यादातर पोस्ट हटा दी गई हैं, लेकिन तीन पोस्ट अब भी X, इंस्टाग्राम और रेडिट पर मौजूद हैं। इन पोस्ट के प्रिंटआउट कोर्ट में पेश करते हुए याचिकाकर्ता पक्ष ने राज्य सरकार से कंटेंट हटाने के लिए जरूरी कार्रवाई की मांग की।
अदालत ने राज्य सरकार के वकील से मामले को गंभीरता से लेने को कहा। बेंच ने कहा कि कोर्ट के सामने रखी गई कुछ सामग्री को सिर्फ खबर बताकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रिकॉर्ड में ऐसी जानकारी सामने आई है जिसकी प्रकृति की जांच जरूरी है।
एजेंसियों को लगाई फटकार
संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की ओर से पेश वकील ने बताया कि नोटिस और कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए चिह्नित आपत्तिजनक पोस्ट पर रोक लगा दी गई है। इस संबंध में हलफनामा दाखिल करने का भरोसा भी दिया गया। हालांकि कुछ पोस्ट अब भी मौजूद होने की बात उठने पर अदालत ने पक्षों को रिकॉर्ड का मिलान कर स्थिति साफ करने को कहा।
बेंच ने कहा कि जब याचिकाकर्ता सीमित संसाधनों के बावजूद ऐसी सामग्री का पता लगा सकता है तो राज्य की एजेंसियों से भी सक्रियता की उम्मीद है। अदालत ने मामले को सरकार और याचिकाकर्ता के बीच टकराव का विषय न मानकर गंभीर सार्वजनिक चिंता से जुड़ा बताया।
हाईकोर्ट ने 4 नवंबर तक टाली सुनवाई
अदालत ने साफ किया कि वह विश्वविद्यालयों से जुड़े राजनीतिक आरोपों की बजाय रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री और संवैधानिक जिम्मेदारियों से जुड़े सवालों तक सुनवाई को सीमित रखना चाहती है। सुनवाई में कंटेंट हटाने की प्रक्रिया और आईटी कानून के नियमों के पालन का मुद्दा भी उठा। पक्षों से स्थिति साफ करने और जरूरी कार्रवाई पर हलफनामा दाखिल करने को कहा गया। हाईकोर्ट ने सुनवाई चार नवंबर तक टाल दी।