विश्व रक्तदाता दिवस पर विशेष

राजन रैखी की प्रेरक कहानी—एक साधारण इंसान, जिसने रक्त की हर बूंद को मानवता के नाम कर दिया
लेखक: दैनिक खबरनामा विशेष संवाददाता
हर शहर की पहचान उसकी इमारतों, सड़कों और बाजारों से होती है। लेकिन कुछ शहर ऐसे लोगों की वजह से भी जाने जाते हैं, जो बिना किसी शोर-शराबे के मानवता की सेवा में अपना पूरा जीवन समर्पित कर देते हैं। चंडीगढ़ के राजन रैखी ऐसे ही एक व्यक्ति हैं, जिनकी कहानी केवल रक्तदान की नहीं, बल्कि जीवनदान की कहानी है।
35 वर्ष पहले, 8 अगस्त 1991 का एक साधारण दिन था। शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि उस दिन एक युवक द्वारा किया गया पहला रक्तदान आने वाले वर्षों में सैकड़ों परिवारों के लिए उम्मीद की किरण बन जाएगा। उस युवक का नाम था—राजन रैखी।
आज जब लोग अपनी उपलब्धियों को पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति से मापते हैं, तब राजन रैखी अपनी सफलता उन मुस्कुराहटों में देखते हैं जो किसी मरीज के जीवन बच जाने के बाद उसके परिवार के चेहरे पर लौटती हैं।
जब दूसरों ने बहाने बनाए, तब उन्होंने रास्ते बनाए
रक्तदान को लेकर समाज में अनेक भ्रांतियां थीं। लोग कमजोरी, बीमारी और तरह-तरह के डर से रक्तदान से बचते थे। लेकिन राजन रैखी ने इन भय और भ्रमों को कभी अपने रास्ते की बाधा नहीं बनने दिया।
उन्होंने केवल रक्तदान नहीं किया, बल्कि एक ऐसा मिशन शुरू किया जो आज भी लगातार जारी है।

पिछले 35 वर्षों में उन्होंने 270 से अधिक बार रक्त, प्लेटलेट्स, बोन मैरो और श्वेत रक्त कोशिकाओं का दान किया है। यह आंकड़ा केवल एक रिकॉर्ड नहीं, बल्कि उन अनगिनत जिंदगियों की कहानी है जिन्हें समय पर रक्त मिलने से नया जीवन मिला।
आधी रात की घंटी और जीवन बचाने की दौड़
कई बार रात के दो बजे फोन बजता था। अस्पताल में कोई मरीज जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहा होता था। परिवार के लोग रक्तदाता की तलाश में भटक रहे होते थे।
ऐसे समय में राजन रैखी ने कभी यह नहीं पूछा कि मरीज कौन है, किस धर्म या जाति का है, या उसे क्या मिलेगा।
उन्होंने केवल इतना पूछा—”कहां पहुंचना है?”
और फिर वे निकल पड़ते थे।

सर्द रातें हों, तपती गर्मी हो या मूसलाधार बारिश—अस्पताल की ओर जाने वाले उनके कदम कभी नहीं रुके।
कोरोना काल का वह सन्नाटा और एक इंसान की हिम्मत
जब पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी के भय से घरों में बंद थी, सड़कें सूनी थीं और लोग एक-दूसरे से दूरी बना रहे थे, तब भी कुछ मरीजों को रक्त की आवश्यकता थी।
कैंसर पीड़ित, गर्भवती महिलाएं, दुर्घटना के शिकार लोग—उनकी जिंदगी लॉकडाउन नहीं समझती थी।ऐसे कठिन समय में भी राजन रैखी अस्पताल पहुंचे। उन्होंने अपनी सुरक्षा की चिंता से ऊपर उठकर मानवता को चुना। महामारी के दौरान 40 से अधिक बार उनका रक्तदान और प्लेटलेट्स दान सैकड़ों लोगों के लिए जीवनरेखा साबित हुआ।
केवल रक्तदाता नहीं, उम्मीदों के निर्माता

राजन रैखी की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल रिकॉर्ड बनाना नहीं है।
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है—लोगों के मन से डर निकालना।
आज वे युवाओं को रक्तदान के लिए प्रेरित करते हैं, मिथकों को तोड़ते हैं और समाज को यह समझाते हैं कि रक्तदान कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत का प्रतीक है।
उनका मानना है कि रक्तदान वह दान है जिसमें दाता कुछ खोता नहीं, लेकिन किसी को पूरी जिंदगी मिल जाती है।
एक रिकॉर्ड से कहीं बड़ी पहचान

उनके असाधारण योगदान को देखते हुए इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स ने उन्हें एक व्यक्ति द्वारा सर्वाधिक बार रक्त और रक्त घटकों के दान के राष्ट्रीय रिकॉर्ड से सम्मानित किया है।
लेकिन जो लोग उन्हें जानते हैं, उनके लिए यह सम्मान भी छोटा है।
क्योंकि उनके लिए राजन रैखी कोई रिकॉर्ड होल्डर नहीं, बल्कि वह व्यक्ति हैं जिसने सैकड़ों घरों के बुझते हुए दीपक फिर से जला दिए।
असली नायक कौन?

आज की दुनिया में नायकों की परिभाषा अक्सर फिल्मों और सोशल मीडिया से तय होती है।
लेकिन चंडीगढ़ का यह शांत स्वभाव वाला व्यक्ति हमें याद दिलाता है कि असली नायक वह होता है जो किसी अनजान व्यक्ति के लिए अपना समय, अपना आराम और अपने शरीर का एक हिस्सा तक समर्पित कर दे।
राजन रैखी ने यह साबित किया है कि मानवता की सबसे बड़ी सेवा किसी मंच, कैमरे या प्रसिद्धि की मोहताज नहीं होती।
कभी-कभी एक इंसान की आस्तीन ऊपर चढ़ाने भर से किसी दूसरे इंसान की पूरी जिंदगी बदल जाती है।
और शायद यही कारण है कि आज सैकड़ों लोग उन्हें रक्तदाता नहीं, बल्कि “जीवनदाता” के नाम से जानते हैं।
राजन रैखी की कहानी हमें यह सिखाती है कि जीवन की सबसे बड़ी सफलता वह नहीं जो हम अपने लिए अर्जित करते हैं, बल्कि वह है जो हम दूसरों को जीने का अवसर देकर हासिल करते हैं।
यह संस्करण अखबार के रविवार विशेष, प्रेरक व्यक्तित्व श्रृंखला या मानवता पर आधारित फीचर लेख के रूप में प्रकाशन योग्य है और पाठकों के साथ भावनात्मक जुड़ाव पैदा करने के उद्देश्य से लिखा गया है।