दैनिक खबरनामा। भोपाल, 16 जुलाई: नर्मदा के पानी को अब सोन बेसिन तक पहुंचाने का रास्ता खुल गया है। कटनी जिले के स्लीमनाबाद में विंध्य की पहाड़ियों को चीरकर तैयार की गई करीब 12 किलोमीटर लंबी भूमिगत सुरंग का निर्माण पूरा हो गया है।
नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण यानी एनबीडीए के अनुसार, 14 जुलाई को सुरंग बनाने में जुटी टनल बोरिंग मशीन टीबीएम निर्धारित सीमेंट वाले कुएं तक पहुंच गई। इसके साथ ही नर्मदा के जल को आगे बढ़ाने के लिए मार्ग साफ हो गया है।
एनबीडीए के एसडीओ दीपक मंडलोई ने बताया कि अब सिर्फ मशीनों को कुएं से बाहर निकालना बाकी है। इस काम को पूरा करने में करीब डेढ़ महीने लगेंगे। इसके बाद नहर में पानी छोड़ा जाएगा।
सदियों पुरानी कथा को मिला नया अध्याय
लोक मान्यता है कि मैकल की पहाड़ियों से निकली नर्मदा का विवाह सोनभद्र से तय था। नर्मदा ने अपनी सहेली जुहिला को सोनभद्र से मिलवाने भेजा था, लेकिन भ्रम में सोनभद्र ने जुहिला को ही नर्मदा समझ लिया। इससे आहत होकर नर्मदा पश्चिम दिशा में मुड़ गईं और सोनभद्र पूर्व की ओर बह निकला।
एक ही पर्वत से जन्मी ये दोनों नदियां तब से अलग-अलग दिशाओं में बह रही हैं। अब इंसान ने विंध्य की चट्टानों के बीच से रास्ता बनाकर मानो रूठी हुई नर्मदा को सोनभद्र से फिर मिलाने का प्रयास किया है।
2011 से चल रहा था काम
नर्मदा दायीं तट नहर परियोजना के तहत यह सुरंग साल 2011 में शुरू हुई थी। सलैया फाटक से खिरहनी गांव तक बनाई गई इस सुरंग का डाउन स्ट्रीम हिस्सा पहले ही तैयार हो चुका था। अप स्ट्रीम का काम 2025 के अंत तक पूरा होना था, लेकिन समय सीमा बढ़ने के बाद अब 2026 में इसे पूरा कर लिया गया है।
दीपक मंडलोई ने बताया, “सोमवार को सिर्फ छह मीटर खुदाई शेष थी, जिसे मंगलवार तक पूरा कर लिया गया।”
मशीनों को बाहर निकालने के लिए NBDA ने 100 फीट गहरा सीमेंटेड कुआं तैयार किया है। अमेरिका और जर्मनी से लाई गई अत्याधुनिक टीबीएम को टुकड़ों में खोलकर क्रेन की मदद से बाहर निकाला जाएगा। सुरंग के अंदर बिछी पटरी और अन्य सामान भी हटाया जाएगा।
लागत और तकनीकी आंकड़े
जब योजना शुरू हुई थी तब अनुमानित लागत 799 करोड़ रुपये थी। काम आगे बढ़ने पर यह बढ़कर 1500 करोड़ रुपये हो गई।
देश की सबसे लंबी सिंचाई जल सुरंग की कुल लंबाई 11.952 किलोमीटर और व्यास 10.14 मीटर है। खास बात यह है कि पानी छोड़े जाने के बाद इसे चलाने के लिए किसी पंप की जरूरत नहीं होगी। नर्मदा का पानी गुरुत्वाकर्षण के सहारे अपने आप सोन बेसिन तक पहुंचेगा।
इंजीनियरिंग के सामने थीं कई चुनौतियां
इस सुरंग को बनाना आसान नहीं था। एक ओर ऊंचा पहाड़ और दूसरी ओर पानी का इंतजार कर रहे खेत थे। बीच में इंजीनियरों और मजदूरों की टीम ने दिन-रात काम किया। खुदाई के दौरान टीम को सिंकहोल, हवा के रिसाव और मिट्टी के धंसने जैसी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। गिरता मलबा, बेहद कठोर चट्टान, कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन और टीबीएम के कटर हेड का बार-बार खराब होना भी बड़ी बाधा बने।
बार-बार आने वाला भूजल काम रोक देता था। लगातार पंप चलाकर पानी निकाला गया। हर नई चट्टान की परत का वैज्ञानिक अध्ययन किया गया। सुरंग के भीतर न दिन था न रात। समय सिर्फ घड़ियों और मशीनों से तय होता था। हवा की गुणवत्ता की भी लगातार जांच होती रही। कई किलोमीटर भीतर काम करने वाले मजदूरों को सूरज सिर्फ शिफ्ट खत्म होने के बाद ही दिखता था।
अब 15 साल की मेहनत के बाद विंध्य को चीरकर निकला यह मार्ग नर्मदा के पानी को सोन तक पहुंचाने के लिए पूरी तरह तैयार है।