दैनिक खबरनामा | 6 अगस्त | मुंबई : बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार को वर्ष 2013 में अपनी एक जूनियर सहयोगी के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में ‘तहलका’ के पूर्व एडिटर तरुण तेजपाल को दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष की कठोर कैद की सजा सुनाई। अदालत ने पहले दिए गए बरी किए जाने के फैसले को पलटते हुए उन्हें रेप और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की अन्य संबंधित धाराओं के तहत दोषी माना।
जस्टिस नीला गोखले और जस्टिस अमित जमसंडेकर की खंडपीठ ने फैसला सुनाते हुए तेजपाल को दो सप्ताह के भीतर जेल अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। इससे पहले इसी पीठ ने गोवा सरकार की उस अपील को स्वीकार किया था, जिसमें मापुसा की सेशंस कोर्ट द्वारा मई 2021 में सुनाए गए बरी करने के आदेश को चुनौती दी गई थी।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में तेजपाल को आईपीसी की धारा 376(2)(एफ), 376(2)(के), 354ए और 354बी के तहत दोषी करार दिया। अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य इन आरोपों को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं।
सजा तय किए जाने के दौरान तेजपाल की ओर से पेश वकील ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने का अवसर देने के लिए सजा पर आठ सप्ताह की रोक लगाने की मांग की। बचाव पक्ष का कहना था कि आरोपी पहले बरी हो चुका था और उसके खिलाफ कोई अन्य आपराधिक मामला भी लंबित नहीं है। वहीं, तेजपाल ने स्वयं अदालत से दया की अपील करते हुए कहा कि वह खुद को इस मामले में पीड़ित मानते हैं और सजा तय करते समय मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाए।
इस मांग का विरोध करते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से कड़ा रुख अपनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों पर स्पष्ट संदेश जाना चाहिए और दोहराया कि “जब कोई लड़की ‘ना’ कहती है, तो उसका मतलब ‘ना’ ही होता है।”
यह मामला एक जूनियर सहयोगी द्वारा लगाए गए आरोपों से जुड़ा है। शिकायत के अनुसार, नवंबर 2013 में गोवा के एक लग्जरी होटल में आयोजित कार्यक्रम के दौरान लिफ्ट के भीतर तरुण तेजपाल ने उसके साथ यौन उत्पीड़न किया था। शिकायत के आधार पर गोवा पुलिस ने रेप सहित कई धाराओं में एफआईआर दर्ज की थी। अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद नवंबर 2013 में तेजपाल को गिरफ्तार किया गया था, जबकि जुलाई 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें नियमित जमानत प्रदान कर दी थी।
बाद में मई 2021 में एडिशनल सेशंस जज क्षमा जोशी ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया था। उस फैसले में कहा गया था कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका और जांच में कई कमियां रहीं। अदालत ने विशेष रूप से सीसीटीवी फुटेज जैसे महत्वपूर्ण साक्ष्य पेश न किए जाने का उल्लेख किया था।
इसके बाद गोवा सरकार ने इस फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी। सरकार का कहना था कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया और कई महत्वपूर्ण तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया।
अपील की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि सेशंस कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ मौजूद साक्ष्यों का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण करने के बजाय घटना के बाद शिकायतकर्ता के व्यवहार और उसकी व्यक्तिगत पृष्ठभूमि पर अधिक ध्यान केंद्रित किया। अभियोजन ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने उन अहम साक्ष्यों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया, जिनमें वह माफीनामा ईमेल भी शामिल था, जिसे शिकायत सामने आने के बाद कथित तौर पर तरुण तेजपाल ने तत्कालीन मैनेजिंग एडिटर को भेजा था।