दैनिक खबरनामा । शिमला, 3 जुलाई: राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) की आंतरिक समीक्षा रिपोर्ट ने हिमाचल प्रदेश में चल रहे परिवार नियोजन कार्यक्रम की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट में सामने आया है कि राज्य में नसबंदी प्रक्रिया के विफल होने की घटनाओं में बीते एक साल में लगभग 14 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2024-25 में नसबंदी के बाद गर्भधारण के 21 मामले दर्ज किए गए थे। वहीं 2025-26 में यह आंकड़ा बढ़कर 24 तक पहुंच गया।
राज्यस्तरीय समिति ने कुल मामलों की जांच के बाद 19 परिवारों को मुआवजे के लिए योग्य माना है। दो आवेदनों को नियमों के दायरे में न आने के कारण खारिज कर दिया गया। वहीं तीन मामलों में दस्तावेज पूरे न होने के चलते उन्हें दोबारा जांच और अतिरिक्त जानकारी जुटाने के लिए जिला इंडेमनिटी कमेटी के पास भेजा गया है।
एनएचएम की स्टेट फैमिली प्लानिंग इंडेमनिटी सब कमेटी की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि डॉक्टरों द्वारा मरीजों के मेडिकल रिकॉर्ड अधूरे रखने और कागजी कार्रवाई में बरती गई लापरवाही एक बड़ी चिंता है। नसबंदी विफलता के सबसे ज्यादा मामले मंडी और शिमला जिलों से रिपोर्ट हुए हैं।
समिति ने पात्र परिवारों को फैमिली प्लानिंग इंडेमनिटी स्कीम के तहत राहत राशि देने को मंजूरी दी है। जांच के दौरान कई अस्पतालों में प्रशासनिक और चिकित्सीय स्तर पर खामियां मिलीं। कई फाइलों में मरीज की पूरी शारीरिक जांच का ब्योरा, बीमारी का स्पष्ट डायग्नोसिस, अल्ट्रासाउंड व लैब रिपोर्ट और सर्जरी से संबंधित दस्तावेज गायब थे। समिति ने इसे गंभीर चूक करार दिया है।
इसे देखते हुए एनएचएम ने प्रदेश के सभी मुख्य चिकित्सा अधिकारियों और सरकारी अस्पतालों को सख्त निर्देश जारी किए हैं। अब परिवार नियोजन से जुड़े हर केस में मरीज की जांच, ऑपरेशन, टेस्ट रिपोर्ट और फॉलोअप का सम्पूर्ण रिकॉर्ड अनिवार्य रूप से सुरक्षित रखना होगा। भविष्य में अधूरे दस्तावेजों के साथ किसी भी मुआवजा दावे को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
रिपोर्ट में साफ किया गया है कि केवल प्रभावित परिवारों को मुआवजा देना ही काफी नहीं है। जहां भी चिकित्सकीय लापरवाही या अन्य गड़बड़ी मिलेगी, वहां संबंधित डॉक्टरों और अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाएगी।