पंजाब 21 मार्च 2026 (दैनिक खबरनामा ) पंजाब के लुधियाना के बहुचर्चित दुष्कर्म एवं हत्या मामले में अहम फैसला सुनाते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने दोषी की फांसी की सजा को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि यह मामला ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ की श्रेणी की सीमा पर जरूर खड़ा है, लेकिन जांच में कुछ कमियां और संदेह की गुंजाइश मौजूद है।जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस सुखविंदर कौर की खंडपीठ ने दोषी को कम से कम 50 वर्ष की वास्तविक कैद भुगतने का आदेश दिया है, जिसमें किसी भी प्रकार की रियायत नहीं दी जाएगी। साथ ही, पाक्सो अधिनियम के तहत 25 वर्ष की सजा भी सुनाई गई है। कोर्ट ने पीड़ित परिवार को 75 लाख रुपये मुआवजा देने के निर्देश भी दिए हैं।
मामले के अनुसार, 28 दिसंबर 2023 को चार वर्षीय बच्ची को उसके दादा के चाय स्टॉल से बहला-फुसलाकर आरोपी अपने साथ ले गया था। वहां उसके साथ दुष्कर्म कर हत्या कर दी गई और शव को छिपा दिया गया। करीब 20 दिन बाद आरोपी को गिरफ्तार किया गया, जिसके बाद निचली अदालत ने उसे फांसी की सजा सुनाई थी।हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए कहा कि आरोपी के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं, लेकिन जांच के दौरान कुछ गंभीर खामियां सामने आईं। इनमें फर्जी अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति, मुख्य गवाह के बयान में विरोधाभास और एक महत्वपूर्ण गवाह की गैर-पेशी शामिल है, जो मौत की सजा के खिलाफ जाते हैं।कोर्ट ने टिप्पणी की कि हत्या पूर्व नियोजित नहीं थी, बल्कि दुष्कर्म के बाद सबूत मिटाने की घबराहट में की गई। पीड़िता को एक असहाय बच्ची बताते हुए अदालत ने कहा कि यह घटना समाज और व्यवस्था की विफलता को दर्शाती है।अदालत ने शिक्षा और सामाजिक मूल्यों में सुधार की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि जीवन के प्रति सम्मान विकसित करना जरूरी है। साथ ही यह भी कहा कि कम उम्र के पीड़ितों के मामलों में सख्त सजा जरूरी है, लेकिन न्याय का सिद्धांत यही है कि कोई निर्दोष दंडित न हो और कोई दोषी बच न सके।

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मामले के अनुसार, 28 दिसंबर 2023 को चार वर्षीय बच्ची को उसके दादा के चाय स्टॉल से बहला-फुसलाकर आरोपी अपने साथ ले गया था। वहां उसके साथ दुष्कर्म कर हत्या कर दी गई और शव को छिपा दिया गया। करीब 20 दिन बाद आरोपी को गिरफ्तार किया गया, जिसके बाद निचली अदालत ने उसे फांसी की सजा सुनाई थी।हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए कहा कि आरोपी के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं, लेकिन जांच के दौरान कुछ गंभीर खामियां सामने आईं। इनमें फर्जी अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति, मुख्य गवाह के बयान में विरोधाभास और एक महत्वपूर्ण गवाह की गैर-पेशी शामिल है, जो मौत की सजा के खिलाफ जाते हैं।कोर्ट ने टिप्पणी की कि हत्या पूर्व नियोजित नहीं थी, बल्कि दुष्कर्म के बाद सबूत मिटाने की घबराहट में की गई। पीड़िता को एक असहाय बच्ची बताते हुए अदालत ने कहा कि यह घटना समाज और व्यवस्था की विफलता को दर्शाती है।अदालत ने शिक्षा और सामाजिक मूल्यों में सुधार की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि जीवन के प्रति सम्मान विकसित करना जरूरी है। साथ ही यह भी कहा कि कम उम्र के पीड़ितों के मामलों में सख्त सजा जरूरी है, लेकिन न्याय का सिद्धांत यही है कि कोई निर्दोष दंडित न हो और कोई दोषी बच न सके।

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