दैनिक खबरनामा 26 अप्रैल 2026 पंजाब की राजनीति में आम आदमी पार्टी (आप) का सफर जितना तेज और रोमांचक रहा है, उतना ही उतार-चढ़ाव और अंदरूनी अस्थिरता से भी भरा रहा। 2012 में एक आंदोलन के रूप में शुरू हुई पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में 24.5 फीसदी वोट हासिल कर 4 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया। खास बात यह रही कि ये चारों सीटें पंजाब से आईं, जिनमें हरिंदर सिंह खालसा, भगवंत मान, प्रो. साधू सिंह और धर्मवीर गांधी जैसे नेता शामिल थे। 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 23.9 फीसदी वोट शेयर के साथ 20 सीटें जीतकर खुद को मुख्य विपक्षी दल के रूप में स्थापित किया, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में इसका ग्राफ अचानक गिर गया और वोट शेयर घटकर 7.5 फीसदी रह गया, जिससे पार्टी सिर्फ एक सीट पर सिमट गई।साल 2022 आप के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ, जब पार्टी ने 42.3 फीसदी वोट शेयर के साथ 92 सीटें जीतकर पंजाब में सरकार बनाई। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने 26.2 फीसदी वोट शेयर के साथ 3 सीटें जीतीं। हालांकि यह सुधार था, लेकिन 2022 जैसी लहर दोबारा नहीं बन पाई।इस पूरे दौर में पार्टी को कई बड़े झटके भी लगे। 2014 में सांसद बने डॉ. धर्मवीर गांधी ने कांग्रेस जॉइन कर ली, जबकि हरिंदर सिंह खालसा को निष्कासित कर दिया गया। इसके अलावा सुखपाल खैरा, एचएस फूलका, कंवर संधू, सुच्चा सिंह छोटेपुर और गुरप्रीत सिंह घुग्गी जैसे कई बड़े नेता भी पार्टी से अलग हो गए।हाल ही में राघव चड्ढा के नेतृत्व में सात राज्यसभा सांसदों का भाजपा में विलय पार्टी के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। पहले से ही अंदरूनी मतभेदों से जूझ रही पार्टी के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तेजी से नए चेहरे लाना, जो कभी पार्टी की ताकत थी, अब उसकी कमजोरी बनती जा रही है।वहीं, पार्टी नेताओं का कहना है कि आप ऐसे राजनीतिक झटकों से घबराने वाली नहीं है और हर चुनौती से मजबूत होकर उभरी है। दूसरी ओर विपक्ष का आरोप है कि पार्टी ने अवसरवाद और बाहरी नेताओं को बढ़ावा दिया, जिसका नतीजा अब सामने आ रहा है।कुल मिलाकर, पंजाब में आप का एक दशक संघर्ष, सफलता, बगावत और सियासी पुनर्गठन की कहानी बन चुका है।
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