दैनिक खबरनामा। होसुर (तमिलनाडु), 19 जून : भारत में आईफोन निर्माण को बढ़ावा देने की महत्वाकांक्षी योजना के बीच टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स की होसुर स्थित फैक्ट्री एक नए विवाद में घिर गई है। किसानों की शिकायतों के बाद तमिलनाडु के स्वास्थ्य अधिकारियों ने जांच शुरू की है कि फैक्ट्री से निकलने वाले तरल अपशिष्ट का आसपास के खेतों और ग्रामीणों के स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ा है।

यह जांच उस पर्यावरणीय विवाद का नया अध्याय है, जिसमें किसानों ने आरोप लगाया है कि टाटा की फैक्ट्री से निकलने वाले प्रदूषित जल ने भूजल और कृषि भूमि को प्रदूषित कर दिया है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 25 मई को फैक्ट्री को नोटिस जारी कर आसपास के खेतों में भूजल प्रदूषण के आरोपों पर जवाब मांगा था।

हालांकि टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स ने इस सप्ताह जारी बयान में कहा कि हाल ही में फैक्ट्री परिसर के भीतर लिए गए जल नमूनों की जांच में किसी प्रकार का प्रदूषण नहीं पाया गया और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अपनी जांच समाप्त कर दी है।

किसानों की शिकायतों के बाद शुरू हुई जांच

2021 में शुरू हुई इस फैक्ट्री में आईफोन के बैक कवर और अन्य पुर्जों का निर्माण किया जाता है। किसानों की शिकायतों के बाद मई के अंत से ही जिला स्वास्थ्य विभाग स्वतंत्र जांच कर रहा है।

27 मई को उल्लुगुरुक्कई गांव के सरकारी चिकित्सा अधिकारी अनीश परवीन द्वारा भेजे गए एक पत्र में कहा गया कि फैक्ट्री से निकलने वाले प्रदूषण के कारण क्षेत्र में तीव्र दुर्गंध फैल रही है और पानी पशुओं के पीने योग्य नहीं रह गया है।

पत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स से छोड़ा गया प्रदूषित  जल आसपास की कृषि भूमि में जमा हो गया है और कुओं के स्वच्छ जल को भी प्रदूषित कर रहा है। ग्रामीणों ने त्वचा संबंधी समस्याओं की शिकायत भी की है, हालांकि अभी तक किसी मामले की चिकित्सकीय पुष्टि नहीं हुई है।

जल नमूनों में मिला ई-कोलाई बैक्टीरिया

स्वास्थ्य अधिकारियों ने खेतों से लिए गए दो जल नमूनों को सरकारी प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजा। रिपोर्ट के अनुसार दोनों नमूनों में ई-कोलाई बैक्टीरिया पाया गया, जो आमतौर पर सीवेज और मलजनित प्रदूषण का संकेत माना जाता है।

इसके अलावा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अप्रैल में फैक्ट्री के पास स्थित दो खुले कुओं के पानी की जांच की थी। रिपोर्ट में पानी में घुले खनिज, लवण और धातुओं का स्तर 1,084 और 1,286 मिलीग्राम प्रति लीटर पाया गया, जो भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा पेयजल के लिए निर्धारित 500 मिलीग्राम प्रति लीटर की सीमा से दोगुने से अधिक है।

विशेषज्ञों का कहना है कि औद्योगिक प्रदूषण से जल में घुले ठोस पदार्थों (टीडीएस) का स्तर बढ़ सकता है, जिससे पानी मानव उपभोग, मत्स्य पालन और वन्यजीवों के लिए अनुपयुक्त हो जाता है।

किसानों का दावा, फसलें हो रही हैं बर्बाद

स्थानीय किसानों का आरोप है कि प्रदूषित पानी के कारण उनकी फसलें नष्ट हो रही हैं और भूमि की उर्वरता प्रभावित हुई है।

40 वर्षीय किसान गुरुमूर्ति वी ने कहा, “यदि हम इस पानी से सिंचाई करते हैं तो बीज अंकुरित तो हो जाते हैं, लेकिन कुछ समय बाद सूखकर नष्ट हो जाते हैं।”

दिसंबर 2025 में स्थानीय सामाजिक न्याय संगठन और 15 किसानों ने टाटा को लिखे पत्र में आरोप लगाया था कि फैक्ट्री का अपशिष्ट जल नालों, तालाबों और भूजल स्रोतों को दूषित कर रहा है, जिससे खेती करना मुश्किल हो गया है।

मामले से जुड़े एक सूत्र के अनुसार दिसंबर में फैक्ट्री के जल शोधन संयंत्र में एक पंप खराब हो गया था, जिसके कारण उपचारित सीवेज का कुछ हिस्सा वर्षा जल संचयन तालाब में पहुंच गया और वहां से बाहर स्थित झील में बह गया। सूत्र ने बताया कि कंपनी ने तुरंत स्थिति को नियंत्रित किया और खराब पंप की मरम्मत कर दी।

भारत में आईफोन निर्माण के लिए अहम है राज्य

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब भारत वैश्विक आईफोन उत्पादन का प्रमुख केंद्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। शोध संस्था काउंटरपॉइंट के अनुसार 2026 तक दुनिया के लगभग 26 प्रतिशत आईफोन भारत में निर्मित होंगे, जबकि चार वर्ष पहले यह आंकड़ा केवल 6 प्रतिशत था।

तमिलनाडु देश के प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण केंद्रों में शामिल है। यहां टाटा की एक अन्य आईफोन असेंबली इकाई भी संचालित है, जबकि सैमसंग और हुंडई जैसी कंपनियों की भी बड़ी विनिर्माण इकाइयां मौजूद हैं।

मामले की जांच जारी है और स्वास्थ्य विभाग तथा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अंतिम रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है।

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