दैनिक खबरनामा। नई दिल्ली, 30 जून : देश में मानसून की धीमी शुरुआत का असर खरीफ फसलों की बुवाई पर साफ दिखाई देने लगा है। सामान्य से कम बारिश होने के कारण किसानों ने धान, कपास, मक्का और सोयाबीन जैसी प्रमुख खरीफ फसलों की बुवाई की रफ्तार धीमी कर दी है। मौसम विभाग के अनुसार, मानसून के आगमन के बाद से अब तक देश के कई हिस्सों में सामान्य से काफी कम वर्षा दर्ज की गई है, जिससे किसानों की चिंता बढ़ गई है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है और वैश्विक चावल निर्यात में उसकी हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत है। देश में खरीफ फसलों की बुवाई आमतौर पर जून और जुलाई में दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगमन के साथ शुरू होती है। इस वर्ष मानसून तय समय से तीन दिन की देरी से केरल पहुंचा और इसके बाद पश्चिमी कृषि क्षेत्रों में इसकी प्रगति लगभग दो सप्ताह तक धीमी रही।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून अभी भी गति पकड़ सकता है और यदि आने वाले दिनों में अच्छी बारिश होती है तो बुवाई में हुई देरी की भरपाई संभव है। फिलहाल इस देरी का फसलों की कीमतों पर क्या असर पड़ेगा, यह स्पष्ट नहीं है। राहत की बात यह है कि सरकारी गोदामों में चावल का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है। जून की शुरुआत में सरकारी चावल भंडार पिछले वर्ष की तुलना में 15 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, जिससे आपूर्ति पर तत्काल दबाव की संभावना कम है।
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 25 जून तक किसानों ने 1.827 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुवाई की है, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में लगभग 23 प्रतिशत कम है।
धान की बुवाई का क्षेत्र घटकर 25.8 लाख हेक्टेयर रह गया है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 34.4 लाख हेक्टेयर था। सोयाबीन की बुवाई 6.92 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो एक वर्ष पहले की तुलना में 65 प्रतिशत कम है। मक्का की बुवाई 15.7 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो 16 प्रतिशत की गिरावट दर्शाती है। कपास का रकबा 35 प्रतिशत घटकर 29.7 लाख हेक्टेयर रह गया है। वहीं, गन्ने की खेती में मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई है और इसका रकबा 1.2 प्रतिशत बढ़कर 57 लाख हेक्टेयर हो गया है।
मौसम विभाग के अनुसार, 1 जून से शुरू हुए चार महीने लंबे मानसून सीजन के दौरान देश के कई हिस्सों में अब तक सामान्य से 50 से 70 प्रतिशत कम बारिश हुई है। कुछ क्षेत्रों में वर्षा की कमी 92 प्रतिशत तक पहुंच गई है। लगातार कम बारिश के कारण जल स्रोतों का स्तर तेजी से नीचे जा रहा है, जिससे किसान सिंचाई को लेकर चिंतित हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आने वाले दिनों में बारिश की कमी बनी रहती है तो इसका असर न केवल फसलों की पैदावार बल्कि कुल उत्पादन पर भी पड़ सकता है। इससे खाद्य सुरक्षा और कृषि अर्थव्यवस्था पर भी दबाव बढ़ने की आशंका है।