मुख्यमंत्री सेहत योजना के तहत पांच महीनों में 1478 उपचार पैकेज स्वीकृत, 2.86 करोड़ रुपये खर्च; हार्मोन थेरेपी सबसे प्रमुख उपचार

दैनिक खबरनामा|चंडीगढ़, 19 जून 2026. पंजाब में प्रोस्टेट कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी के बीच स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने पुरुषों, विशेषकर 50 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के लोगों को शुरुआती लक्षणों को गंभीरता से लेने और समय पर जांच कराने की सलाह दी है। स्टेट हेल्थ एजेंसी (एसएचए), पंजाब के आंकड़ों के अनुसार मुख्यमंत्री सेहत योजना के तहत पिछले पांच महीनों में प्रोस्टेट कैंसर से संबंधित 1478 उपचार पैकेज स्वीकृत किए गए, जिन पर 2.86 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. बलबीर सिंह ने बताया कि स्वीकृत उपचारों में लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा हार्मोन थेरेपी का रहा है। कुल 918 मरीजों को यह उपचार दिया गया, जिस पर 1.57 करोड़ रुपये खर्च हुए। उन्होंने कहा कि एडवांस्ड प्रोस्टेट कैंसर के इलाज में हार्मोन थेरेपी सबसे प्रभावी विकल्पों में से एक है, क्योंकि यह शरीर में टेस्टोस्टेरोन के स्तर को नियंत्रित कर ट्यूमर की वृद्धि को धीमा करने में मदद करती है।

स्टेट हेल्थ एजेंसी के अनुसार हार्मोन आधारित उपचारों में लियूप्रोलाइड दवा का सबसे अधिक उपयोग किया गया। इसकी विभिन्न खुराकों से संबंधित 853 प्रक्रियाएं की गईं, जिनकी लागत 1.43 करोड़ रुपये से अधिक रही। इसके अलावा 490 मरीजों को कीमोथेरेपी दी गई, जिस पर 1.15 करोड़ रुपये खर्च हुए। कुछ उन्नत कीमोथेरेपी पैकेजों की लागत प्रति उपचार 3.58 लाख रुपये तक पहुंची। योजना के तहत रेडिएशन थेरेपी की सुविधा भी प्रदान की गई, जिसमें 70 फ्रैक्शन पर 13.36 लाख रुपये खर्च किए गए।

सरकारी मेडिकल कॉलेज, पटियाला के यूरोलॉजी विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. सुप्रान शर्मा ने कहा कि आर्थिक सहायता मिलने से मरीजों को समय पर इलाज मिल रहा है और महंगे उपचारों के कारण होने वाली देरी में कमी आई है। उन्होंने बताया कि 50 वर्ष से अधिक आयु के पुरुषों को पेशाब में खून आना, पेल्विक क्षेत्र में दर्द, बार-बार पेशाब आने की समस्या और बिना किसी कारण वजन कम होना जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

डॉ. शर्मा ने सलाह दी कि 50 वर्ष की आयु के बाद पुरुषों को नियमित रूप से प्रोस्टेट स्पेसिफिक एंटीजन (पीएसए) जांच करवानी चाहिए, जबकि जिन लोगों के परिवार में प्रोस्टेट कैंसर का इतिहास है, उन्हें 40 वर्ष की आयु से ही नियमित स्क्रीनिंग शुरू कर देनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि आनुवंशिक कारण इस बीमारी के प्रमुख कारकों में शामिल हैं, हालांकि जीवनशैली से जुड़े कुछ कारण भी इसके जोखिम को बढ़ा सकते हैं। यदि शुरुआती अवस्था में बीमारी की पहचान हो जाए तो मरीज के स्वस्थ होने की संभावना काफी बढ़ जाती है और कीमोथेरेपी जैसे जटिल उपचारों की आवश्यकता भी कम हो सकती है।

डॉ. सुप्रान शर्मा ने कहा कि मुख्यमंत्री सेहत योजना के तहत उपलब्ध वित्तीय सहायता के कारण अधिक से अधिक मरीज बिना आर्थिक चिंता के समय पर इलाज करवा पा रहे हैं, जिससे जीवनरक्षक उपचारों तक उनकी पहुंच मजबूत हुई है और जेब से होने वाला खर्च भी कम हुआ है।

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