हरियाणा 8 मार्च 2026 ( दैनिक खबरनामा ) हरियाणा पत्रकार राम चंद्र छत्रपति हत्याकांड में बरी किए जाने के फैसले के बाद पंजाब और हरियाणा की राजनीति में चर्चाएं तेज हो गई हैं। यह फैसला ऐसे समय आया है जब पंजाब में अगले विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे गति पकड़ रही हैं और हरियाणा में अगले महीने निकाय चुनाव होने की संभावना है। ऐसे में डेरा सच्चा सौदा के प्रभाव को लेकर राजनीतिक हलकों में नई बहस शुरू हो गई है।
पंजाब और हरियाणा की राजनीति में डेरा सच्चा सौदा का प्रभाव लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। दोनों राज्यों के कई प्रभावशाली नेता समय-समय पर डेरा का आशीर्वाद लेने जाते रहे हैं। खासकर पंजाब के मालवा क्षेत्र में डेरा के अनुयायियों की बड़ी संख्या मानी जाती है। बठिंडा, मानसा, फरीदकोट, मुक्तसर, संगरूर और फाजिल्का जैसे जिलों में कई विधानसभा सीटों पर डेरा समर्थकों की संख्या इतनी है कि वे चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।बीते चुनावों में भी कई राजनीतिक दल डेरा समर्थकों का समर्थन हासिल करने की कोशिश करते रहे हैं। इसी तरह हरियाणा के पंजाब से सटे सिरसा, अंबाला, कुरुक्षेत्र और हिसार जैसे क्षेत्रों में भी डेरा का अच्छा प्रभाव माना जाता है। ऐसे में गुरमीत राम रहीम को मिली कानूनी राहत का मनोवैज्ञानिक प्रभाव उनके अनुयायियों पर पड़ सकता है। हालांकि साध्वियों से रेप के मामले में वे अभी भी जेल में हैं, लेकिन इस फैसले से उनके समर्थकों के बीच सकारात्मक संदेश जा सकता है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि डेरा नेतृत्व किसी राजनीतिक दल के पक्ष में खुलकर समर्थन देता है तो मालवा क्षेत्र की कई सीटों पर चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। हालांकि इसका दूसरा पहलू भी है। पंजाब की राजनीति में सिख धार्मिक संगठनों और डेरा परंपराओं के बीच लंबे समय से वैचारिक टकराव रहा है। ऐसे में किसी दल को डेरा का खुला समर्थन मिलने पर कुछ सिख मतदाताओं के बीच नकारात्मक प्रतिक्रिया भी हो सकती है।फिलहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले चुनावों में डेरा किस राजनीतिक दल का समर्थन करता है। उधर, चुनावी तैयारियों को लेकर भाजपा समेत अन्य दलों ने भी कमर कस ली है। इन दिनों हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी लगातार पंजाब के दौरे कर रहे हैं, जिससे वे वहां की राजनीति में चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। भाजपा पंजाब में अपना जनाधार मजबूत करने के लिए पारंपरिक समीकरणों से बाहर नए सामाजिक समूहों को जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। वहीं, आम आदमी पार्टी भी आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए अपनी तैयारियों में जुटी हुई है।

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